मनुष्य : प्रकृति : यात्रा

आज के आधुनिक जीवनशैली और इसकी जरूरतों को पूरा करने कि आपाधापी में हम स्वयं कि प्रकृति से जो कि यात्राएं हैं उसे भी करने से दूर होते जा रहे हैं।
यदि आप यात्रा करते हैं और अपनी सुविधा का पूरा ध्यान रखते हैं तो आप यात्रा कि वास्तविक दर्शन से वंचित रह जाते है और वे यात्राओं के दौरान होने वाले अनुभव और दर्शन से चूक जाते हैं।

यात्रा का संपूर्ण अनुभव से हटकर एक बनावटी और वित्तपोषित आनंद को मूल और वास्तविक यात्रा दर्शन अनुभव मान कर वापस लौट आते हैं जिससे यात्रा के दौरान जब हम जीवन के जो अलग अलग पहलुओं को देखते है जीवन के अभावों का अनुभव करते है बिना छत के रात गुजारते है सुनसान हाइवे पर बाइक चलाते है गांवों के गड्ढों से गुजरते हुए लोगों के चेहरों के भाव को पढ़ते है खेतो के बीच से गुजरते हुए रास्तों के किनारे कही कही अधनंगे खेलते हुई बच्चे दूर खेत में काम करती महिला और ट्रैक्टर चलाते यूवक को देखना 
तंबूओं में बसर करती जिंदगी इन सभी के जीवन के कुछ पल के टुकड़ों को यात्रा दर्शन में एक महत्वपूर्ण भूमिका होता है, तभी आपको जीवन में समाज के क्रियाओं में विभिन्नता में एकता का अहसास और अनुभव यात्रा ही करा सकती है।

जरूरी नहीं यात्रा दूर हो विलासपूर्ण हो भोग प्रमाद हो बल्कि आप नजदीक की ही यात्रा करिए सादगी से और यात्रा के दौरान आप का मन पूर्ण रूप से सजग और साक्षी भाव में दर्शन करे तभी वास्तव में यात्रा का सुख अनुभूतियां आप को रोमांचित तार्किक सम दृष्टा बनाएगी।

30 जुलाई 2025
© अशोक कुमार 

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