आज से बारह साल पहले, कॉलेज के दिनों में, काशी स्टेशन पर ली गई एक तस्वीर मेरे फेसबुक टाइमलाइन पर फिर से सामने आई। रोहित वर्मा, जिसके पास उन दिनों एक अच्छा कैमरे वाला फोन था, ने अचानक ही वह तस्वीर खींच ली थी। उस वक्त के हमउम्र लोगों में अच्छे कैमरे वाले फोन बहुत कम होते थे, और यह तस्वीर उसी दुर्लभता की कहानी कहती है।
यह तस्वीर में मेरे चेहरे को नहीं, बल्कि उस समय को हमेशा के लिए सुरक्षित कर गई। जब मैंने इसे अपने फेसबुक पेज पर देखा, तो अपने जीवन के उतार-चढ़ावों का पूरा सफर मेरी आँखों के सामने से एक क्षण में गुज़र गया जैसे कोई फिल्म का फ्लैशबैंक चला हो।
प्रसिद्धि, नौकरी, और सामाजिक जीवन की न्यूनतम परिभाषा को पूरा करने की जद्दोजहद में, आज मैं उस युवा से काफी दूर आ चुका हूँ जो उस तस्वीर में मौजूद है।
इस पुरानी तस्वीर को देखते ही मुझे अचानक एक आत्म-साक्षात्कार हुआ। समय के साथ अनुभव किए गए सभी भाव वास्तविक लगने लगे। मुझे एहसास हुआ कि 'सब अच्छा करने' की कोशिश में मैंने अपने निजी व्यक्तित्व का कितना ह्रास किया है।
उस वक्त के मेरे आदर्शों, सपनों और आज अपना और अपनों और समाज की हकीकत से आज मैं रूबरू हूँ
मेरे मन ने यह बात गहराई से पकड़ ली है कि यदि हम समय के प्रवाह का सम्मान नहीं करते, तो जीवन की सार्थकता और ऊर्जा दोनों ही अस्त-व्यस्त और दिशाहीन हो जाती हैं। अब मैंने यह तय किया है कि मैं वर्तमान को पूरी तरह से जीने की कला को विकसित करने पर स्वयं पर काम करूँगा।
शायद भारत के हर आध्यात्मिक गुरु ने अपने-अपने तरीके से इस बात को समझाया है, लेकिन इस एहसास को खुद अनुभव करना एक ईश्वरीय उपहार है। यह एहसास अपने आप में आनंद के और पूर्णता के मुक्तिबोध से भरा हुआ है।
4 अगस्त 2025
पैतृक निवास
अशोक कुमार
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