मौसम का मज़ाक और इंसान की भूल

मौसम अब पहेली नहीं, मज़ाक बन गया है। सुपर-कंप्यूटर, सैटेलाइट और अरबों के यंत्रों से लैस मौसम वैज्ञानिक भी चकरा जाएँ। मोबाइल पर राज्य का अलर्ट आता है, "आज धूप खिलेगी", और बाहर झमाझम बारिश शुरू। हम हँस देते हैं, विभाग को कोस देते हैं, पर यह हँसी कितनी खोखली है?

तकनीक फेल नहीं हुई, हमने प्रकृति को फेल कर दिया है। बेमौसम बारिश, मार्च में लू, दिसंबर में उमस, ये कोई संयोग नहीं। यह उन चंद लोगों की भूख का नतीजा है जिन्होंने विकास के नाम पर जल, जंगल, जमीन और जीव सबको निचोड़ डाला। उनके लिए कारखाने की चिमनी से निकलता धुआँ प्रगति का ध्वज है, और कटते पेड़ GDP के आँकड़े हैं। राजनीतिक ताकत और पैसे के दम पर उन्होंने प्रकृति को अपनी जागीर समझ लिया।
फ़ोटो साभार AI meta 

इस विश्व पर्यावरण दिवस पर सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि क्लाइमेट चेंज के असली गुनहगार इसके दंड से बचे रहेंगे। उनके बंगलों में एसी चलेंगे, उनके गोदामों में अनाज भरा रहेगा, उनके बच्चे विदेशों में बस जाएँगे। भुगतेगा कौन? मोतिहारी का किसान जिसकी फसल डूबी, सुंदरवन का मछुआरा जिसका घर समंदर निगल गया, और वह मजदूर जो 45 डिग्री में भी ईंट ढो रहा है।

मौसम विभाग का पूर्वानुमान गलत नहीं है, हमारा आचरण गलत है। हमने प्रकृति के गणित को अपने लालच से इतना जटिल कर दिया कि अब कोई सूत्र काम नहीं करता। सवाल तकनीक का नहीं, नीयत का है। जब तक कुछ लोगों की उन्नति की परिभाषा में पृथ्वी की कीमत शामिल नहीं होगी, तब तक हर अलर्ट मज़ाक ही रहेगा। आने वाली पीढ़ी पूछेगी तो क्या जवाब देंगे, कि हमें सब पता था, पर हमने कुछ किया नहीं?

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