आभासी दुनिया और हमारी स्वतंत्रता का भ्रम


सोशल मीडिया: विचारों का मंच या बाज़ार का नियंत्रित खेल?
क्या हम वास्तव में इतने परिपक्व, व्यवहारिक और समझदार हो चुके हैं कि अपने स्वतंत्र विचारों को सोशल मीडिया पर खुले तौर पर रख सकें?
हाल ही में जब मैं अपने इंस्टाग्राम अकाउंट को देख रहा था, तो वहाँ बार-बार नफ़रत, हिंसा, बेवफ़ाई, बेईमानी और हत्या से जुड़े वीडियो रील के रूप में दिखाई दे रहे थे। यह देखकर मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि जिस विचार और स्वतंत्रता की भावना के साथ इस डिजिटल क्रांति की नींव रखी गई थी, क्या आज भी वह अपने मूल उद्देश्य पर कायम है? या फिर यह सब बाज़ारवाद के हवाले होकर केवल विचारों के आदान-प्रदान तक सीमित न रहकर हमारे जीवन को नियंत्रित करने का एक माध्यम बनता जा रहा है?
इस बात के कई उदाहरण मेरे अनुभव में भी सामने आए हैं। जब भी मैं किसी विषय के बारे में सोचता हूँ या उस पर चर्चा करता हूँ, कुछ समय बाद वही विषय मेरे सोशल मीडिया की स्क्रीन पर स्वतः दिखाई देने लगता है। यह केवल संयोग नहीं लगता। यदि आपका मन उदास है, आप खुश हैं या आप हास्य के मूड में हैं, तो उसी से जुड़ी सामग्री लगातार आपकी स्क्रीन पर आने लगती है। अलग-अलग क्रिएटर द्वारा बनाए गए, लेकिन एक ही प्रकार की सामग्री बिना खोजे ही बार-बार सामने आती रहती है।
ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी बातचीत, भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ पढ़कर उसी के आधार पर बाज़ार का निर्धारण किया जा रहा हो और उसी अनुरूप प्रचार-प्रसार की रणनीति बनाई जा रही हो?
यदि ऐसा है, तो यह निश्चय ही चिंताजनक और शर्मनाक है। यह हमारी निजता का उल्लंघन है। लेकिन इसे इतनी शालीनता और सलीके से किया जाता है कि हम स्वयं ही अपनी डिजिटल ज़िंदगी की कुंजी उनके हाथों में सौंप देते हैं। परिणाम यह होता है कि हमारा डिजिटल जीवन हमारे हिसाब से कम और उनके हिसाब से अधिक चलने लगता है।
जब आभासी दुनिया ही वास्तविक जीवन का आधार बनने लगे, तो झूठ, धोखा, फ़रेब और चरित्रहीनता भी कभी-कभी सम्मान के प्रतीक की तरह प्रस्तुत किए जाने लगते हैं।
वास्तव में यह स्थिति अत्यंत भयावह है। क्योंकि धीरे-धीरे हमारी खुशियाँ, रिश्ते-नाते, त्यौहार और सामाजिक संबंध सब कुछ सिमटकर महज़ सोशल मीडिया की स्क्रीन तक सीमित होते जा रहे हैं।
आज की युवा पीढ़ी जब तक निजता के महत्व को सही अर्थों में समझ पाएगी, तब तक संभव है कि उनकी निजता की लगाम किसी और के हाथों में जा चुकी हो। और विडंबना यह है कि उस समय गुलामी उन्हें गुलामी नहीं, बल्कि शान प्रतीत होगी। इस भ्रम का प्रभाव इतना प्रबल है कि लोग ख़ाक होने को भी महान समझने लगते हैं।
इसलिए समय रहते जागिए, समझिए और व्यवहारिक जीवन से अधिक जुड़िए। आभासी दुनिया का उपयोग अवश्य कीजिए, लेकिन संतुलन के साथ।
क्योंकि जिस दिन हम यह समझेंगे कि हम सोशल मीडिया का उपयोग नहीं कर रहे, बल्कि सोशल मीडिया हमारा उपयोग कर रहा है — वही दिन असली जागरूकता का दिन होगा।

©अशोक कुमार 
12 मार्च 2026
बक्सर बिहार

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