आत्महत्या एक अभिशाप

आज मेरे कुल में एक बिटिया ने आत्महत्या कर ली। कारण क्या था, अभी नहीं जानता।

पर एक ऊर्जावान, प्रतिभाशाली बेटी का यूं असमय चले जाना, जिसने अपनी बुद्धिमत्ता के दम पर देश के शीर्ष संस्थानों में से एक, NIT में जगह बनाई थी — यह स्वीकार करना कठिन है। न जाने किस बोझ के आगे वह हार गई।

यही बच्ची हमारे कुल, परिवार, गांव, डीहवार के लिए एक लकीर थी — स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की, उम्मीद की, प्रेरणा की। उसने दिखाया था कि मेहनत से रास्ते बनते हैं। 

नियति के अपने नियम हैं, जिन्हें हम बदल नहीं सकते। पर मन बार-बार यही सोचता है — काश, एक बार बात हो जाती। चाहे समस्या जितनी भी गंभीर रही हो, बात करने से शायद कोई रास्ता निकल आता। शायद और भी संभावनाएं थीं, बेटा। 

काश तुम देख पातीं — अपनी मां की आंखों की थकान, अपने पिता का निरंतर श्रम, तुम्हारे बेहतर भविष्य के लिए उनका घर-गांव छोड़कर पलायन। और तुम... तुम हम सबको यूं अचानक छोड़कर चली गईं। क्यों, बच्ची, क्यों?

किसी भी पिता के लिए इससे क्रूर समय नहीं होता, जब जिस संतान को उसने पहली बार गोद में लेकर चूमा था, उसी को अंतिम बार कंधा देना पड़े। नियति सचमुच हमारे वश में नहीं।

इसलिए बस एक बात सबसे कहनी है — कोई भी कदम उठाने से पहले एक पल रुककर सोचिए। आप अकेले नहीं हैं। आपके पीछे एक पूरा परिवार है, उनकी उम्मीदें हैं, उनका जीवन है। आपका एक निर्णय उनके पूरे संसार को बदल देता है। बस एक बार बात कर लीजिए। मदद मांग लीजिए। अंधेरा स्थायी नहीं होता।

हे बाबा रामेश्वर नाथ, मां विंध्यवासिनी, इस असहनीय दुःख को सहने की शक्ति देना परिवार को। 

अशोक कुमार 
बक्सर बिहार 

हरि ॐ 🙏

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