पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव को जिस तरह सोशल मीडिया और मुख्यधारा के एक हिस्से में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह चिंताजनक है। ऐसा आभास दिया जा रहा है मानो बंगाल भारत के लोकतांत्रिक ढांचे का हिस्सा न होकर कोई विजित होने वाला भूखंड हो, जिसकी ‘मुक्ति’ केवल भारतीय जनता पार्टी की जीत से ही संभव है। इसके विपरीत तर्क यह गढ़ा जा रहा है कि यदि कोई अन्य दल जीता तो राज्य ‘दक्षिण कोरिया’ बन जाएगा—अर्थात् विरोधी खेमे में चला जाएगा।
हर राजनीतिक दल चुनाव लड़ता है तो जीतना चाहता है। यह स्वाभाविक है। जीत के लिए कुछ नीतियाँ सार्वजनिक होती हैं, कुछ रणनीतियाँ परदे के पीछे बुनी जाती हैं। युद्ध हो या चुनाव, बिसात हमेशा मनोविज्ञान की आधारशिला पर बिछती है। परन्तु प्रश्न यह है—क्या वाकई परिस्थिति ऐसी हो गई है कि भाजपा के न जीतने पर बंगाल भारत का हिस्सा नहीं रहेगा? तथ्यात्मक रूप से यह दावा निराधार है। यह विमर्श मुख्यतः सोशल मीडिया के इमेज-कंसल्टेंटों द्वारा गढ़ी गई भ्रामकता है, जिसका उद्देश्य ध्रुवीकरण को तीखा करना है।
सोशल मीडिया पर ऐसा नैरेटिव बनाया जा रहा है मानो बंगाल में वर्षों से न कोई हँसा है, न त्योहार मना है, न अपनत्व बचा है। समाज को एक कृत्रिम रेखा से दो हिस्सों में बाँट दिया गया है—एक तरफ सत्तारूढ़ खेमा, दूसरी तरफ ‘विजय के बाद आज़ादी की हवा’ चलाने का दावा करने वाला खेमा। यह द्विभाजन लोकतंत्र की आत्मा—विविधता में एकता—के विरुद्ध है।
हाल ही में एक दृश्य और वायरल हुआ: माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एक झालमुरी विक्रेता से दस रुपये की झालमुरी खरीदते हैं और कहते हैं, “प्याज खाते हैं मगर दिमाग नहीं खाते।” झालमुरी खरीदना अनुचित नहीं है। जन-नेता का जनता से जुड़ाव लोकतंत्र को जीवंत करता है। परन्तु पद की गरिमा भाषा और व्यवहार की मर्यादा भी माँगती है। प्रधानमंत्री का पद संस्थागत गंभीरता का प्रतीक है। वाक्चातुर्य और व्यंग्य की भी एक लक्ष्मण-रेखा होती है, जिसे सार्वजनिक संवाद में नहीं लाँघना चाहिए।
विडंबना देखिए—यही दल तमिलनाडु के चुनाव में ‘आज़ादी’ या ‘मुक्ति’ का विमर्श नहीं गढ़ता। वहाँ हार-जीत को सत्ता के सामान्य गणित की तरह लिया जाता है। परन्तु बंगाल को लेकर यह आग्रह है कि “बंगाल चूका तो सब जीत निरर्थक हो जाएगी।” यह वैचारिक आक्रामकता राजनीति को दिशाहीन बना रही है। जब जीत ही एकमात्र ध्येय बन जाए और स्वयं को ‘उद्धारक’ के रूप में परिभाषित किया जाने लगे, तो राजनीति नीति-विहीन लालसा में बदल जाती है।
इस तरह की कुंठित विजय-लिप्सा कितनी उचित है, इसका निर्णय पाठक करें। परन्तु यह निर्विवाद है कि हम राजनीति के एक अराजक दौर से गुज़र रहे हैं। पक्ष और विपक्ष दोनों ने ‘केवल दूसरे को गलत साबित करने’ का चश्मा पहन लिया है। आरोप-प्रत्यारोप के इस कोलाहल में कोई भी बात अंतिम सत्य नहीं रह गई। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के माथे पर काली हस्ताक्षर के समान है।
चुनाव आते-जाते रहेंगे, सरकारें बनेंगी-बिगड़ेंगी। परन्तु यदि विमर्श की मर्यादा ही न बची, यदि बंगाल या कोई भी राज्य ‘जीतने योग्य भूखंड’ मात्र बनकर रह गया, तो लोकतंत्र की आत्मा क्षत-विक्षत होगी। लोकतंत्र संवाद से चलता है, विजय-उन्माद से नहीं। जीत का मनोविज्ञान जितना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक है हार को स्वीकार करने की लोकतांत्रिक विनम्रता
लेखक: अशोक कुमार
स्थान: बक्सर बिहार
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