वास्तविक संत कौन है?

आज गंगा जी के घाट पर बैठे हुए मन में एक विचार कौंधा कि इस संसार में वास्तविक संत कौन है, जिसका सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए, किंतु जिस पर हमारा ध्यान अपेक्षाकृत कम और अन्यत्र अधिक केंद्रित रहता है?

इस विचार का उत्तर खोजने के क्रम में कई साधु-संतों से मिला। सभी ने अपने-अपने विचारों के अनुसार अलग-अलग उत्तर दिए, किंतु उनमें से कोई भी उत्तर मुझे पूर्णतः संतुष्ट नहीं कर पाया।

इसी क्रम में एक दिन मैं छत पर टहल रहा था। तभी अचानक मन में एक विचार कौंधा कि हमारे जन्म से लेकर जीवनपर्यंत स्वयं को न्योछावर कर देने वाला वह व्यक्ति, जिस पर साहित्य की दृष्टि भी अपेक्षाकृत कम पड़ी है और जिसके बिना इस संसार का आधार ही संभव नहीं, वह कोई और नहीं, बल्कि हमारे पिताश्री हैं।

क्योंकि पिता के बिना जीवन का प्रत्येक कदम किसी बड़ी जंग को जीतने से भी अधिक कठिन प्रतीत होने लगता है। पिता के न होने पर धूप हो या छाँव, जीवन के प्रत्येक अनुभव का सामना स्वयं ही करना पड़ता है।

ऐसे समय में जिनसे साथ देने की उम्मीद होती है, वे भी कभी-कभी कन्नी काट लेते हैं, अथवा हमारे कदम पीछे खींचने में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मूक सहयोगी बन जाते हैं।

समाज में ऐसे अनेक उद्धरण प्रचलित हैं, जिनमें कहा गया है कि पिता के अतिरिक्त संसार में कोई भी व्यक्ति आपको स्वयं से अधिक आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहता।

अन्य संत ज्ञान देंगे, मार्ग दिखाएँगे, किंतु पिता वह संत हैं, जो ज्ञान देने के साथ-साथ उस मार्ग पर चलने का साहस और प्रेरणा भी प्रदान करेंगे। वे जीवन के प्रत्येक कदम पर सुरक्षा की ढाल बनकर आपके साथ खड़े रहेंगे।

पिता वह माली हैं, जिनकी बगिया में प्रत्येक फूल, पौधे और वृक्ष का ख्याल रखा जाता है। वे भी अपनी सामर्थ्य और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार हर संभव प्रयास करते हैं, ताकि उनकी बगिया सदैव हरी-भरी रहे।

इसलिए बाहरी संसार के किसी भी संत की तुलना में आपके घर में विराजमान, आपके जन्मदाता पिता ही आपके लिए सबसे बड़े, सबसे दयालु, सबसे सहयोगी और सुरक्षा प्रदान करने वाले संत हैं।

अतः मेरे मन में उठे प्रश्न का उत्तर अंततः मेरे अपने ही विवेक ने दिया कि—

पिता ही वास्तविक संत हैं।

1 नवंबर 2026
चरित्रवन, बक्सर

अशोक द्विवेदी

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