हाल ही में एक बहुप्रचलित पर्व बीता है, जिसे हम सभी करवा चौथ के नाम से जानते हैं। कभी यह पर्व मुख्यतः पंजाब और उसके आसपास के क्षेत्रों तक सीमित था, जहाँ इसकी अपनी सांस्कृतिक परंपरा, लोकविश्वास और सामाजिक महत्ता थी। किंतु समय के साथ धारावाहिकों, सिनेमा और आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने इसे जिस व्यापक स्वरूप में प्रस्तुत किया, उसने धीरे-धीरे इस पर्व को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न रहने देकर वैवाहिक जीवन की अनिवार्य अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित कर दिया।
आज ऐसा प्रतीत होता है कि करवा चौथ का अर्थ केवल पति की दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला व्रत नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसी सामाजिक अपेक्षा में परिवर्तित हो चुका है, जिसमें प्रेम की अभिव्यक्ति का मूल्य उसके आर्थिक प्रदर्शन से आँका जाने लगा है।
व्रत से पहले सौंदर्य प्रसाधनों की खरीदारी, ब्यूटी पार्लर में अग्रिम बुकिंग, मेंहदी की सजावट, महँगी साड़ियों और आभूषणों का चयन, उपहारों का आदान-प्रदान, विशेष भोज और घर की सजावट—इन सबके बीच कहीं न कहीं एक ऐसा बाज़ार खड़ा हो गया है, जो प्रेम और समर्पण की भावनाओं को भी अपनी व्यावसायिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालता हुआ दिखाई देता है।
प्रथम दृष्टया यह अनुभव होता है कि परंपरा की आत्मा से अधिक उसके बाहरी आडंबर को महत्त्व दिया जाने लगा है। अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि किसी दंपति के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण कितना गहरा है, बल्कि यह भी बन गया है कि पति अपनी पत्नी के लिए कितना खर्च कर सकता है और पत्नी अपने साज-श्रृंगार के माध्यम से सामाजिक अपेक्षाओं पर कितनी खरी उतर सकती है।
विडंबना यह है कि जो व्यक्ति इन आर्थिक अपेक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ है, उसे कभी-कभी पिछड़ा, उदासीन अथवा अपनी पत्नी के प्रति प्रेमहीन समझ लिया जाता है। मानो प्रेम की कोई निर्धारित आर्थिक सीमा हो, जिसके नीचे उतरते ही संबंधों की गरिमा संदिग्ध हो जाती हो।
लेकिन इस पूरे विमर्श का एक दूसरा, कहीं अधिक गंभीर और पीड़ादायक पक्ष भी है।
समाचारों में समय-समय पर ऐसी घटनाएँ सामने आती रही हैं, जहाँ किसी स्त्री द्वारा पति के लिए व्रत रखने के बावजूद अपने प्रेमी अथवा अन्य व्यक्ति से मिलने जाने और वहाँ व्रत खोलने जैसी परिस्थितियाँ सामने आईं। ऐसी घटनाओं को किसी व्यापक सामाजिक सत्य का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा, किंतु इनके भीतर छिपे मानवीय द्वंद्व और विश्वासघात के प्रश्न को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
क्योंकि किसी भी वैवाहिक संबंध की वास्तविक नींव व्रत, उपवास, आभूषण अथवा सामाजिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि परस्पर विश्वास और भावनात्मक निष्ठा होती है।
और जब कोई पुरुष अपने जीवन की संपूर्ण ऊर्जा, अपने सपने, अपनी इच्छाएँ और अपनी सामर्थ्य किसी स्त्री के साथ एक साझा भविष्य बनाने में समर्पित कर देता है, तब उसके विश्वास का टूटना केवल एक संबंध का टूटना नहीं होता। वह उस व्यक्ति के भीतर बसे संसार का विघटन होता है, जिसे उसने अपने प्रेम के सहारे निर्मित किया था।
ऐसी स्थिति में उसकी पीड़ा को केवल क्रोध अथवा आहत अहंकार कहकर सीमित नहीं किया जा सकता। वह पीड़ा उस विश्वास की मृत्यु से उपजती है, जिसके सहारे उसने जीवन की कठिनाइयों को स्वीकार किया था। वह व्यक्ति स्वयं से, अपने निर्णयों से और अपने उन सपनों से प्रश्न करने लगता है, जिन्हें उसने कभी साझा भविष्य की नींव समझा था।
यहाँ प्रश्न किसी स्त्री या पुरुष के पक्ष में खड़े होने का नहीं, बल्कि उस मानवीय मूल्य की रक्षा का है, जिसे हम विश्वास कहते हैं।
करवा चौथ का वास्तविक सौंदर्य तभी सार्थक हो सकता है, जब वह प्रेम की सहज अभिव्यक्ति बने, न कि सामाजिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम; जब वह परस्पर सम्मान का प्रतीक बने, न कि एकतरफा त्याग की अपेक्षा; और जब उसका उत्सव बाहरी साज-श्रृंगार से अधिक उस आंतरिक निष्ठा को महत्त्व दे, जिसके बिना कोई भी वैवाहिक संबंध केवल एक सामाजिक व्यवस्था बनकर रह जाता है।
अंततः, प्रेम को किसी एक दिन के उपवास, किसी महँगे उपहार अथवा चाँद के दर्शन तक सीमित नहीं किया जा सकता।
जिस संबंध में विश्वास जीवित है, वहाँ हर दिन करवा चौथ है; और जहाँ विश्वास ही मृत हो चुका है, वहाँ सबसे सुंदर श्रृंगार भी संबंधों की रिक्तता को नहीं भर सकता।
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